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Friday, February 28, 2014

बंद का बंदरबांट

लेख : हसनैन मुबश्शिर उस्मानी

आज बिहार के लोगों के लिए एक कष्टप्रद दिन था . जो लोग किसी आवश्यकता के तहत ट्रेन यात्रा करने के लिए मजबूर थे उन्हें भाजपा के रेल रोको आंदोलन के कारण गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ा। भाजपा कार्यकर्ताओं ने जहां तहां रेल आवागमन में रुकावट डाली और कई महत्वपूर्ण ट्रेनों को अलग अलग  रेलवे स्टेशनों पर जबरन रोका गया . यात्री बेहाल और परेशान इधर उधर भटकने और बेजा इंतजार के लिए मजबूर कर दिए गए . और यह सब राज्य की जनता की भलाई के नाम पर किया गया . मांग थी कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिया जाए ।  हाँ यही मांग नीतीश कुमार भी लम्बे  समय कर रहे हैं लेकिन भला  हो चुनावों का कोई किसी से पीछे क्यों रहे।  नीतीश कुमार  ने 2 मार्च को बिहार बंद का ऐलान किया तो भाजपा ने आज 28 फरवरी को ट्रेन का  चक्का जाम कर दिया . अब इसमें बेचारी जनता  का जो हाल हो । . छात्र परीक्षा दे पाए या न दे पाएं इससे किसी का क्या बिगड़ता है . यात्री अपने गंतव्य तक पहुंचे या न पहुंचे किसी नेता ने यह ठेका तो ले नहीं रखा . यहाँ तो चुनाव से पहले अपनी गोटी चमकानी   है . यह जाताना है कि राज्य सबसे बड़े हितैषी तो बस उनकी ही पार्टी है . विशेष राज्य का दर्जा मिलने के बाद मिलने वाली मदद  में बेचारी जनता का क्या हिस्सा होगा यह सभी जानते हैं . उसे कल भी दो रोटी पाने के लिए अपना खून पसीने की तरह बहाना पड़ता था और उसे भविष्य में भी खून पसीना एक करना है . राज्य में बाढ़ के नाम पर करोड़ों रुपये आते हैं लेकिन प्रभावित लोगों तक कितना पहुँचता  है।
भाजपा के एक नेता ने यात्रियों को एक दिन पहले ही बंद के दिन यात्रा न करने का फरमान जारी कर दिया।  लेकिन उन्होंने यह सोचा कि अगर उन्हें कभी किसी जरूरी काम से बाहर जाना हो और उन्हें घर में बंद रहने की सलाह दी जाए तो उनके दिल पर क्या गुज़रेगी . तथ्य यह है कि इस तरह के बंद से इन नेताओं को  कोई फर्क नहीं पड़ता।  उनके रिश्तेदार और परिवार अपने घरों में ऐश करते हैं।  अब आज ही के बंद कि बात करें किसी भी ट्रेन में कोई नेता या उसके रिश्तेदार इस बंद से होने वाली तकलीफों का  शिकार बनें होंगे । शायद नहीं . दुख और पीड़ा चाहे वह किसी भी रूप में हो वह तो जनता के भाग्य में ही आई है।
विरोध के कई तरीके हैं . इन नेताओं को विरोध करना केजरीवाल से सीखना चाहिए . जिन की   एक आवाज पर लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है . लेकिन इसके लिए ईमानदारी पहली शर्त है ।  भाजपा हो या और कोई भी पार्टी उसके  नेता सर्दियों में चार डिग्री सेल्सियस के तापमान में जनता के लाभ  के लिए खुले आसमान के नीचे सोने की हिम्मत करेगा . नहीं वे तो बस किराए के  प्रदर्शनकारिओं  को लेकर दुकानों के शीशे तोड़ सकते हैं या मजबूर  यात्रियों की आवाजाही में रुकावट पैदा कर सकते हैं।
केजरीवाल ने धरना दिया तो इसका विरोध इतने जोरों पर किया गया  जैसे देश का सारा सिस्टम ठप पड़ गया हो . विशेष आदेश जारी कर मेट्रो का आवागमन रोक दिया गया  . हालांकि उन प्रदर्शन  करने वालों का उद्देश्य आम लोगों को तकलीफ पहुंचाना कतई नहीं था . केजरीवाल के विरोध में लोगों की भीड़  शामिल रही लेकिन कभी आम आदमी का रास्ता नहीं रोका गया ।  किसी तरह की कोई बदअमनी पैदा करने की कोशिश नहीं की गई ।  दूसरी पार्टियों को केजरीवाल का विरोध करने के बजाय उनसे सीखने की जरूरत है कि कैसे आम नागरिकों को असुविधा पहुंचाए बिना उन्हें अपने प्रदर्शन का हिस्सा बनाया जाता है ।  लेकिन इसके लिए जनता का अपने नेताओं पर भरोसा होना चाहिए जो कि शायद अब नहीं है।  यही कारण है कि यह दल अपने विरोध को सफल बनाने के लिए अराजकता का सहारा लेना जरूरी समझते  हैं।  महाराष्ट्र में इस तरह के बंद के खिलाफ अदालत ने कुछ कड़े फैसले लिए थे जरूरत है कि इस तरह के बंद से होने वाले नुकसान का हर्जाना  बंद की अपील करने वाली पार्टियों से प्राप्त किया या कम से कम जनता ही अगले चुनाव में इन पार्टियों से पांच साल तक होने वाली तकलीफों का हिसाब बराबर कर लें अब गेंद जनता के पाले में है ।

यह भी देखें : साले को खूब दौड़ाया 

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